Saturday, April 12, 2008

३ क्षणिकायें...

जीवन कठिन डगर है
जो साँसें नहीं हैं गहरी
कैसे प्रभु मिलेगें
मन जो रहेगा लहरी
~~~~~~~~~~
मैनें धर्म को अधर्म के साथ
चुपचाप खड़े देखा है
मैं अधर्म की अट्टाहस से नहीं
धर्म की खामोशी से हैरान हूँ
~~~~~~~~~~
जहाँ छोड़ रख्खा हो उजाला
सबने भरोसे सूर्य के
वहाँ जलता हुआ एक दीप भी
किसी सूरज से कम नहीं

7 comments:

अमिताभ फौजदार said...

जीवन कठिन डगर है
जो साँसें नहीं हैं गहरी
कैसे प्रभु मिलेगें
मन जो रहेगा लहरी !!
bhaut khoob likha hai bhai

अभिनव said...

भाई रीतेश जी,
टू गुड बात हो गई ये तो. एक एक क्षणिका बार बार पढी.. सबसे अच्छी ये लगी ..

मैनें धर्म को अधर्म के साथ
चुपचाप खड़े देखा है
मैं अधर्म के अट्टाहस से नहीं
धर्म की खामोशी से हैरान हूँ


पर बाकी भी बहुत बढ़िया लगीं, आशा है की आगे भी आपके द्वारा ऐसी सुंदर कृतियों का सृजन होता रहेगा.,.

रवीन्द्र प्रभात said...

जीवन की सच्चाईयों को प्रतिविम्बित करती सुंदर क्षणिकाएँ !

Reetesh Gupta said...

भाई अमिताभ, अनुभव और रवीन्द्र जी,

आपकी टिप्पणी और प्रोत्साहन के लिये हार्दिक आभार....धन्यवाद

रीतेश

अभिषेक ओझा said...

रीतेश जी पहली बार आज आपकी ब्लॉग पर आया... बहुत अच्छा लिखते हैं आप. कई सारे पोस्ट पढ़ डाले... बुकमार्क कर लिया है बाकी के लिए. धन्यवाद ... इतनी अच्छी रचनाओ के लिए.

Jaya gupta said...

Reetesh Bhai
Bhoot hi saral bhasha main apne sacchai bayan ki hai.
App wakai main badhai ke patra hain.

seema gupta said...

जीवन कठिन डगर है
जो साँसें नहीं हैं गहरी
कैसे प्रभु मिलेगें
मन जो रहेगा लहरी !!

"wah jvab nahee"

regards