तेरी इस दुनियाँ में प्रभु जी
रंग-बिरंगे मौसम इतने
क्यों फ़िर सूखे-फ़ीके लोग
थोड़ा खुद हँसने की खातिर
कितना रोज रुलाते लोग
बोतल पर बोतल खुलती यहाँ
रहते फ़िर भी प्यासे लोग
पर ऎसे ही घोर तिमिर में
मेधा जैसे भी हैं लोग
सत्य, न्याय और धर्म की खातिर
लड़ते राह दिखाते लोग
एक राम थे जिनने हमको
लक्ष्मण-भरत से भाई दिये
और यहाँ सत्ता की खातिर
लड़ते देश लुटाते लोग
Sunday, April 06, 2008
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6 comments:
बढ़िया है रितेश.
अच्छा लिखा है।
लालाजी और हर्षवर्धन जी,
आपकी टिप्पणी और प्रोत्साहन के लिये हार्दिक धन्यवाद....रीतेश
प्रखर सोंच…।
हमारे ही भीतर सारी संभावनाएँ हैं और साथ-2 विखंडन भी…।
प्रखर सोंच…।
हमारे ही भीतर सारी संभावनाएँ हैं और साथ-2 विखंडन भी…।
अत्यन्त सुंदर अभिव्यक्ति !
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