Saturday, April 05, 2008

रौशनी और अंधकार...

मैनें देखा है रौशनी को
हाथों में अंधकार लिये
अंधकार से लड़ते हुये
निरंतर चल रहे
इस संघर्ष में
रौशनी को थकते हुए
अंत में नहीं रही रौशनी
हमारे बीच
अंधकार आज भी
वैसा ही खड़ा है
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मैनें देखा है रौशनी को
हाथों में रौशनी लिये
अंधकार से लड़ते हुये
निरंतर चल रहे
इस संघर्ष में
अंधकार को थकते हुए
अंत में रौशनी बढ़ी है
हमारे बीच
अंधकार आज भी
वैसा ही खड़ा है

4 comments:

रवीन्द्र प्रभात said...

कविता के माध्यम से सच परोसने की एक और कोशिश , बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ... बधाईयाँ !

Udan Tashtari said...

उत्कृष्ट भाव हैं, बधाई रीतेश.

मीत said...

बहुत सुंदर. बधाई.

Reetesh Gupta said...

रवीन्द्र जी, लालाजी, और भाई मीत,

आपने कविता पढ़ी ..अच्छी लगी ...उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद