Sunday, December 20, 2015

मेरी राह है रोशन बड़ी...

मुझे याद है जब इस सफ़र पर चलना किया हमने शुरू
हम ही थे चेले यहाँ और हम ही थे अपने गुरु
हराकर हर ताप को कुंदन से हम हरदम खिले
खुशियाँ मिलीं शोहरत मिली और कई नये मकसद मिले
आज फ़िर से आई है वैसी परीक्षा की घड़ी
अब मैं अंधेरों से क्यों डरूं मेरी राह है रोशन बड़ी

1 comment:

kuldeep thakur said...

जय मां हाटेशवरी....
आप ने लिखा...
कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
दिनांक 21/12/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर... लिंक की जा रही है...
इस चर्चा में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
कुलदीप ठाकुर...