Wednesday, January 28, 2009

दशानन...


कैसे राम ने जीता रावण
कैसे राम बने जगदीश
शीश एक क्यूँ जीत ना पाया
दस सिर लेकर भी दसशीश
निश्छल मन और निर्मल ह्रदय
जहाँ राम की ढाल बने
मलिन ह्रदय और कपट वहीं पर
दशानन का काल बने
बुद्धी-कौशल और राजनीति का
जहाँ रावण ने अभिमान किया
भेज अनुज को उसे सीखने
राम ने उसको मान दिया
हर बुराई तुम यहाँ देख लो
दस सिर लेकर आती है
पर धर्मवीर रघुवीर के आगे
वह नहीं टिक पाती है

7 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया, रितेश.

आशुतोष दुबे "सादिक" said...

aapne thik hi likha hai,ki ram ke aage rawan ki haar honi hi hai.

vikram7 said...

सुन्दर...वधाई

रवीन्द्र प्रभात said...

लाजवाब....!

Jaya gupta said...

ise kahten hain kavita.
Reetesh aap hain sahee mayne me ek kabile tareef KAVI, BADHAI

sandhyagupta said...

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ .

Reecha Sharma said...

keep it up reetesh